Do We Really Want Gorkhaland?

By Upendra

Do We Really Want Gorkhaland?


Mairead Maguire once said, “We frail humans are at one time capable of the greatest good and, at the same time, capable of the greatest evil…” I feel ashamed to say that my community is slowly transforming into the “greatest evil”, devoid of any feelings, humanity, compassion and forgiveness.
I feel ashamed today that my people have become emotionless, machine like. There is no sympathy to be seen anywhere, people are becoming brutal by the day and it makes me wonder do we really want Gorkhaland at the cost losing our soul to the devil? Do we really want Gorkhaland at the cost our people being devoid of any emotion or human values? Do we really want Gorkhaland if our people loose what makes us stand out amongst the billions – our compassion? Do we really want Gorkhaland at the cost of becoming heartless zombies?
A name that is not tolerated today in the hills at all is that of Mr. Subash Ghishing, and he deserves to be hated. But what is the fault of Mrs. Dhan Maya (Dhan Kumari) Ghishing? Why was her dead body not allowed to enter the hills? Who are those heartless people who could not even accord her the privilege of a decent cremation/burial in her own motherland? The same motherland for which every Gorkhali is currently fighting for and has been fighting for the past 107 years. Why is GJMM being so paranoid, what threat does a dead body pose to Gorkhaland?
What is the use of having our own land, if our own people have to take permission from a political party just to provide a decent funeral to the departed? People world over desire to breathe their last in their own land; Mrs. Ghishing could not afford the luxury of this simple privilege, yet she has the right to 6 feet of her own land. This is an inalienable right and it would be very unfortunate if GJMM leaders do not show compassion at this moment. History is watching and it is watching our actions closely, please do not allow your egos and emotions to overtake your humanity. Even countries that are at war allow the enemy to collect the body of their fallen soldiers or provide a decent burial, not because it stops war, but because it is the right thing to do, it is the honorable thing to do.  By preventing Mrs. Ghishings body to be cremated/buried in Darjeeling GJMM is slurring the honor of Gokhali’s world over.
I don’t know about others, but I have this feeling that the cost of Gorkhaland should never exceed basic decency and human values. GJMM should not forget that we are fighting for a land to call our own and what use will be such a land if our own people are banished and driven out and not allowed to come back to that very same land even after they are dead? If the people of Darjeeling can unite against Mr. Ghishing today, they can unite against GJMM tomorrow. I wonder if the same treatment is meted out against the present day GJMM leaders tomorrow, how will they react? As the popular saying goes “Daiba ko Latthi Sabai Maathi”.
Let us not forget that Gorkhaland is a very pious and religious goal for all Gorkhalis, please do not make a mockery of our emotions. We want Gorkhaland but we do not want a dead body being stopped from entering Gorkhaland. We do not want political parties making a mockery of the departed should. We do not want our people to become heartless, feelingless and emotionless. We have lived through such an era for past 20 years, what is the use of demanding Gorkhaland if we have to live through the same suffering all over again for another 20 more years?
I hope, GJM leaders have not lost their honor and decency and I appeal to them to show compassion if not towards Mr. Ghishing then at least towards Late Mrs. Dhanmaya.
Finally, I leave you with immortal lines from the poem “Utsarg Gara”…. “Dekhos Na Dekhos Yo Bartamaan… Bhawi Pidi Ley Dekhney Chha… Kasailey Chadma Bhesh Ma Timro Itihaas Lekhdai Chha…”.
Hope! I made some sense.

Source: Darjeeling times

सुभाष घीसिंग रॉ के एजेंट हैं- बिमल गुरुंग

बंगाल से अलग गोरखालैंड राज्य बनाए जाने का आंदोलन अपने चरम पर है. मार्च 2010 तक गोरखालैंड नहीं बनने पर खुद को गोली मार लेने का दावा करने वाले बिमल गुरुंग के नेतृत्व में जितनी आक्रमकता के साथ आंदोलन चल रहा है, उससे पहाड़ गरमाए हुए हैं. पहाड़ के देवता कहलाने वाले सुभाष घीसिंग को भी इन आंदोलनकारियों के कारण दार्जिलिंग छोड़ना पड़ा और अब उनके पैतृक घर पर बिमल गुरुंग की पार्टी का कब्जा है. हालांकि बिमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी आंदोलन कहते हैं.

यहां पेश है आलोक प्रकाश पुतुल के साथ की गई बातचीत के अंश

 

� नया गोरखालैंड राज्य बनाने का आपका आधार है, क्या-क्या मुद्दे हैं ?

गोरखालैंड अलग राज्य आज की मांग नहीं है. 101 साल पुरानी मांग है ये. भारत की आज़ादी की मांग से भी पुरानी. कुछ राजनीतिक दल इसे राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं. इसे वोट मांगने के लिए मुद्दा बनाते हैं. मेरे लिए गोरखालैंड की मांग राजनीतिक मांग नहीं है. हमारे लिए गोरखालैंड हमारी अस्मिता से जुड़ा हुआ मुद्दा है.

सुभाष घीसिंग ने गोरखालैंड आंदोलन के साथ धोखा किया है

 

हम भारत देश में रहते हैं, हमारे गोरखा सैनिक इस देश के लिए शहीद होते हैं लेकिन हम आज भी उपेक्षित हैं. आज तक हम लोगों को कुछ लोग विदेशी बोलते हैं. हमें हमारा हक नहीं दिया जा रहा है.

� आपसे पहले भी आपके जो पुराने साथी रहे हैं सुभाष घिसिंग, वो भी इसी तरह की बातें किया करते थे. वो भी कहते थे कि गोरखालैंड जरूरी है.

1986 में जब हम लोगों ने अलग गोरखालैंड का आंदोलन छेड़ा था, उस समय में मैं एक सिपाही था. लेकिन सुभाष घीसिंग ने आंदोलन को जब बेच दिया और गोरखालैंड काउंसिल की बात मान ली तो हमने उसका साथ छोड़ दिया, सुभाष घीसिंग को खारिज कर दिया. 2005 में जब छठवीं अनुसूची के मुद्दे पर कोलकाता में वार्ता शुरु हुई तो 17 प्रतिनिधि वहां थे लेकिन उनमें से 16 लोगों को कमरे के बाहर बैठा दिया गया और अकेले सुभाष घीसिंग वहां बात करते रहे. क्या बातें हुईं, क्या समझौता हुआ, ये केवल वही जानें.

� आपको ऐसा लगता है कि सुभाष घिसिंग ने केंद्र सरकार या पश्चिम बंगाल सरकार के साथ दबाव या प्रलोभन में कोई समझौता किया ?

समझौता तो किया ही. सुभाष घिसिंग तो रॉ का आदमी है. ये सरकार का आदमी है. वो दृश्य हमलोगों ने देखा है. हमने देखा कि पहाड़ के आदमी के साथ छल कपट हो गया. हमें लगा कि जनता को असली चेहरा बताना पड़ेगा. तो इसी हिसाब से हम लोगों ने जनता को बता दिया कि ये सुभाष घिसिंग ठीक काम नहीं कर रहा है. जनता ने वोट देकर उसको वहां पर चेयर में रखा लेकिन वो चेयर के अधिकारी के मुताबिक वहां पर काम नहीं कर रहा है. तो इसी हिसाब से हम लोगों ने वहां विरोध कर दिया कि हम लोगों को छठवीं अनुसूची नहीं चाहिए. हमें गोरखालैंड चाहिए.

� 1986 में सुभाष घिसिंग ने भी आंदोलन किया था तो उन्होंने भी कहा था कि हम गोरखालैंड ही चाहते हैं कुछ और नहीं चाहते हैं. बिमल गुरुंग ये कहते हैं कि दो साल में अगर गोरखालैंड नहीं बना तो मैं अपने को गोली मार दूंगा या इसी तरह की दूसरी बातें.

देखिए एक बात है कि हमने ये निर्णय लिया है और उस निर्णय के अनुसार हम काम कर रहे हैं. गोरखालैंड अलग राज्य के लिए ये एक अंतिम लड़ाई है और उस अंतिम लड़ाई को हम लोगों को जीतना पड़ेगा. जीतना पड़ेगा, इसी हिसाब से हम लोग एक रणनीति बना कर आगे आ रहे हैं. तो हम लोग जो कर सकते हैं, करेंगे ही. झारखंड बन गया, उत्तराखंड बन गया, इतना विभिन्न राज्य बन गया. तो हमारा गोरखालैंड क्यों नहीं बन रहा है ? हमारे 1200 लोग इस आंदोलन में शहीद हो गए. इन लोगों को बंगाल सरकार ने मारा, तो हमें न्याय चाहिए. इस शोषण का, अत्याचार का बदला हम जरुर लेंगे. हम अपने बच्चों को बोल कर आए हैं कि हम अलग गोरखालैंड ले कर रहेंगे. हम लोग राजनीति नहीं कर रहे हैं. हमें जेल की राजनीति, मंत्री की राजनीति नहीं करनी. हमें तो हमारा गोरखालैंड अलग राज्य चाहिए. अपने शरीर का एक-एक बूंद रक्त बहा कर भी हम लोगों को गोरखालैंड चाहिए.

� झारखंड का जो आंदोलन रहा उसमें लोगों ने हथियार उठा कर लड़ाईयां लड़ीं. इससे पहले गोरखालैंड का भी जो आंदोलन रहा है, 1986 का उसमें भी 1200 लोगों ने अपनी शहादत दी और एक हिंसा का रास्ता इख्तियार किया. आप कहते हैं कि आप गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे ?

हां. हम गांधीवादी तरीके से ही लड़ेगे. कितने मारेगी सरकार हमें ? कितनी गोली चलाएगी ? आदमी लोगों को मारकर सरकार को इसका क्या लाभ मिलेगा ? हमारे देश में महात्मा गांधी जन्में, जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं. तो मैं तो उनकी ही नीति जानता हूं. मैं उनकी कद्र करता हूं और उनके ही रास्ते पर चल कर हम अलग गोरखालैंड चाहते हैं.

जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री रहते हैं, वहां दिल्ली में जा कर तो मैं धरन-जुलूस निकाल सकता हूं लेकिन अपने घर में दार्जिलिंग में हमें बंगाल सरकार धरना नहीं देने देती, जुलूस नहीं निकालने देती. ये कौन सा गणतंत्र है ?


ये दंगा फसाद करके, टेरर करके, आदमी का सिर उड़ा के ये नहीं होगा. अभी देखिए इराक का क्या हालात हो गया, अमरीका ने वहां पर बम की बारिश किया. इराक ने भी वहां पर अमरीका के आदमी लोगों को कितना मारा. लेकिन बात क्या हुआ ? आखिर में वार्ता में आना ही पड़ता है.


हम लोग नंदीग्राम नहीं बनाना चाहते. हम लोग गणतांत्रिक हिसाब से आंदोलन करना चाहते हैं. अब ये देश गणतांत्रिक देश है. इस गणतांत्रिक देश में गणतंत्र का हनन हो रहा है. इसलिए हम लोग बोल रहे हैं- ये अन्याय हो रहा है. बंगाल सरकार अभी अन्याय कर रही है. हम लोगों को मीटिंग करने नहीं दे रही है. हम लोगों को नारा, जुलूस करने नहीं दे रही है. ये किस हिसाब की नीति है ?

जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री रहते हैं, वहां दिल्ली में जा कर तो मैं धरन-जुलूस निकाल सकता हूं लेकिन अपने घर में दार्जिलिंग में हमें बंगाल सरकार धरना नहीं देने देती, जुलूस नहीं निकालने देती. ये कौन सा गणतंत्र है ? मैं मार्क्सवाद, लेनिनवाद का विरोध नहीं कर रहा लेकिन उनके नाम पर जो लोग सरकार चला रहे हैं, अशोक भट्टाचार्य जैसा लोग, वे गलत नीति अख्तियार कर रहे हैं.

� आम जनता में जो एक धारणा फैल रही है, खासकर के जो हिंदी प्रदेश है उनके अंदर ये धारणा फैल रही है कि अगर गोरखालैंड बना तो इस इलाके में हिंदी भाषियों का रहना मुश्किल हो जाएगा.

हिंदुस्तान मेरी मां है और हमारा जो भी गोरखालैंड का मानचित्र है, उस मानचित्र के भीतर रहने वाले जितने भी आदिवासी, बंगाली, राजवंशी, बिहारी, मधेशिया और मुस्लिम जितने भी समुदाय हैं हम एकसूत्र होकर लड़ेंगे. एकसूत्र होकर हम लोग उसमें एक दायित्व निभाएंगे. हमारे लिए सभी हमारे हैं और हम एक भी आदमी को बाहर नहीं जाने देंगे.

� आपने जैसे कहा कि सिलिगुड़ी या दार्जिलिंग के जो माकपा लीडर हैं या अशोक भट्टाचार्जी का जैसे आपने नाम लिय़ा. तो जब सरकारें इस तरह से इतनी आक्रमक हों कि आपको सभा नहीं करने दे रही हों तो वो सरकारें आपको राज्य कैसे देंगी.

देना ही पड़ेगा. देना ही पड़ेगा. समय़ आ जाएगा. नजदीक है समय.

� दो साल में तो आपने …

हां. नजदीक है. नजदीक है… हम लोग बताएंगे बाद में. देना ही पड़ेगा. कैसे नहीं देंगे ?

�  आपने जो कहा कि मार्च 2010 जो है, हम लोगों को गोरखालैंड मिल जाएगा.

मार्च 2010 हम लोगों का लक्ष्य है गोरखालैंड लेने के लिए. उसके उधर नहीं, इधर. 2010 मार्च का आगे नहीं. ये हमारा लक्ष्य है. लक्ष्य बोलने का मतलब है हमारी इच्छा.

�  तो क्या योजना है आपकी ?

है योजना. वो आहिस्ते आहिस्ते हम लोग प्रोग्राम खोलेंगे.

� बिमल गुरुंग के बारे में कहा जाता हैं कि वो बहुत आक्रमक लीडर हैं. आक्रमक लीडर अब गांधी की तरह संघर्ष की मुद्रा में कैसे आ गए.

1986 के आंदोलन में बिमल गुरुंग एक आक्रमक लीडर था. एक सिपाही था…. कितना खून-खराबा हुआ. लेकिन हमने अब जब आंदोलन को अपने हाथ में लिया है तो हम चाहते हैं कि गांधी जी के रास्ते में चल कर हम अपनी लड़ाई लड़ें. अहिंसा की नीति को अपनाते हुए.

� आपके पास कोई दूरगामी योजना है गोरखालैंड की ? देश के हरेक हिस्से में इस इलाके के लोग काम की तलाश में भटकते रहते हैं तो गरीबी के खिलाफ, अशिक्षा के खिलाफ, बेरोजगारी के खिलाफ आपके पास किस तरह की योजना है ? आखिर गोरखालैंड अलग राज्य के तौर पर किस तरह सर्वाइव करेगा ?

इसी हिसाब से तो हम लोग अलग गोरखालैंड राज्य की बात कर रहे हैं. हमारे पहाड़ का आदमी, तराई का, ये डूअर्स का आदमी सब जगह बिखरे हुए हैं-रोजी रोजगार के लिए. तो हमें इनके लिए ही तो गोरखालैंड चाहिए. हम चाहते हैं कि हमारे लोगों को हमारे इलाके में ही रोजगार चाहिए. इसे हम अपने हिसाब से करेंगे ?

 


� आपका हिसाब क्या है. मतलब क्या करेंगे ?

वो तो करेंगे हम लोग

 रोज़गार के लिए क्या करेंगे ?

रोज़गार के लिए देखिए हमारे पास बहुत संसाधन हैं. पहाड़ का जो तराई क्षेत्र है, चाय बगान वाला हिस्सा, वहां चाय, फिर जंगल हैं, फिर खनिज हैं, पत्थर हैं…. हमारे पास इतना कुछ है कि घर-घर में रोजगार दिया जा सकता है. डुआर्स हो, दार्जिलिंग का पहाड़ हो, सिलिगुड़ी हो….इन सबका इतना विकास किया जा सकता है, जिनकी कल्पना नहीं की जी सकती है.

� झारखंड, छत्तीसगढ़ औऱ उत्तराखंड इन तीनों राज्यों का विकास उस तरह से नहीं हुआ जैसी उम्मीद थी. आपको कैसे लगता है कि आप अलग राज्य बन जाने के बाद ज्यादा विकास करेंगे ?

हमारे पास खनिज संसाधन बहुत है. इसी से बंगाल सरकार तो अपना काम चला रही है. केंद्रीय सरकार इसका टैक्स खा रही है. उस स्त्रोत हमारे पास है ना. हमें अपना विकास का तरीका देखना होगा.

 बिमल गुरुंग गांधीवादी है, लेनिनवादी हैं, मार्क्सवादी हैं ?

बिमल गुरुंग नहीं नहीं हम गांधीवादी हैं, मार्क्सवादी, लेनिनवादी नहीं हैं. मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं. क्योंकि हम इस देश में पैदा हुए हैं. इस देश की कद्र करना चाहता हूं. हम गांधी के बच्चे हैं. लेनिनवादी यहां की नीति नहीं है. मार्क्सवाद यहां की नीति नहीं है. हम लोगों को गांधीवादी को अपनाना ही होगा. भारत में अगर आप हैं तो आपको गांधी की निति से ही चलना पड़ेगा.

� ये मार्क्सवादी आपके खिलाफ क्यों है. क्या कारण है ?

अब देखिए ये तो हम लोग को, मार्क्सवादी का अपना विरोध का तरीका है. अपना एक दायित्व है. हम लोग का अपना एक दायित्व है. हम लोग हिंदुस्तान में रहते हैं, हम लोग हिंदु है. हम लोग भगवान मानते हैं, वो लोग मानते नहीं है. ये ही है…

11.08.2008, 16.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित (http://www.raviwar.com/baatcheet/B8_VIMAL-GURUNG-ALOKPUTUL.shtml)

GJMM takes over Ghisingh’s house

Statesman News Service
DARJEELING, July 29: In the ongoing series of events that followed the violence on 25 July in Darjeeling, GJMM supporters today occupied fallen GNLF leader Mr Subash Ghisingh’s luxurious residence at Manju Tea Estate located around 15 km from Mirik. “Mr Ghisingh’s residence will now be a public property. It will be used as a GJMM office from now on. The residence will also accommodate guests when programmes are held in Mirik,” declared Mr Roshan Thapa, GJMM branch committee president in Manju Tea Estate.
Today’s move follows the 25 July violence in Darjeeling during which, GJMM supporters vandalised Mr Ghisingh’s residence at Dr Zakir Hussain road in Darjeeling town. Once the undisputed king of the Hills, GNLF supremo Mr Subash Ghisingh has had to relinquish power, give up his possessions and flee the Hills with uncertainty hanging over his return ever, all in a span of six months and today he lost his grand white two storied building, which must have cost Mr Ghisingh a fortune to build in a modest place like Manju Tea Estate.
The people in awe of him when Mr Ghisingh enjoyed a next to God image in the Hills will now get a glimpse of the interiors that was shut to outsiders for the past many years. The GNLF chief himself never spent a night at the residence in the past 21 years of his tenure, stopping by only to rest for a few hours. His brother-in-law Mr Kapil Allay who handed over the keys to the GJMM leaders in Mirik today used to look after the house.

DARJEELING BURNS – CHAOS REIGNS SUPREME – GJM SUPPORTER SHOT DEAD BY UNKNOWN ASSAILAINTS – SUBASH GHISINGH, DEEPAK GURUNG, N.B. KHAWAS ATTACKED (Photos)

All Photos by Barun Roy (Beacononline)

DARJEELING BURNS – CHAOS REIGNS SUPREME – GJM SUPPORTER SHOT DEAD BY UNKNOWN ASSAILAINTS – SUBASH GHISINGH, DEEPAK GURUNG, N.B. KHAWAS ATTACKED

BREAKING NEWS

A Beacon Online Exclusive

By Barun Roy

Darjeeling: Rapid round of firing from Deepak Gurung’s house by unknown assailants over GJM Rally led to one dead. Pramila Chettri, aged 36 and resident of Merryvilla, an employee of the HDFC Bank was mortally wounded. She was declared dead at the District Hospital at 2:55 pm and the cause of death as excessive bleeding and punctures on the left ovary. Anu Sharma, Pramila’s sister said that Pramila was not even the part of the GJM Rally and was returning with her friends after attending a religious function. The firing by assailants led to massive unrest in the town as mobs of disgruntled people marched to the GNLF leaders house and stoned them. Subash Ghisingh, Deepak Gurung and N. B. Khawas all prominent leaders of the GNLF were attacked by the people. An outraged mob set fire to Deepak Gurung’s house. Two cars were burn and the house ransacked. As chaos spread out towards the town more cars were burnt purportedly of GNLF sympathizers. There are no reaction from the Police and Section 144 have not yet been imposed.

Read more at: http://beacononline.wordpress.com

From Kalimpong: One bike of GNLF supporter Mr. Changba is burnt, stones thrown at the house of Roshan Rai. The market was closed after 4.30 pm. 

Gorkhaland Rundown

It was brought to my attention that a few weeks ago this blog turned up on the second page of Google searches for Gorkhaland. (It has since fallen lower in the Google search results.) Given the visibility, I’ll add a little more background on the history and current happenings. Here goes:

The district of Darjeeling in India is a boarder region in the foothills of the Himalayans with Bhutan, China (Tibet), Bangladesh, and Nepal as close neighbors. Darjeeling is the northernmost region of the state of West Bengal. Starting in the 1810’s, disputes over the district resulted in it changing hands between Nepal, Sikkim, and the British East India Company. Once the British East India Company had firm control of the area in the mid-nineteenth century, it began developing the tea industry and established a hill station. Laborers from Nepal were brought in for agricultural work, supplementing the existing Nepali, aka Gorkha, population, which had settled in the hills in the late 17th century. The Gorkhas formed an important part of the British army under colonialism. They were prized as skilled fighters, and the Gorkha regiments were highly revered. After Indian independence from Britain in 1947, British tea estate owners left, and Bengalis stepped in as the new economic ruling class. Gorkhas continued to serve proudly in the Indian Armed Forces.

The Darjeeling district is unique in the state of West Bengal as it is a hills region mostly populated by Nepali-speaking Gorkhas, whereas the rest of the state is a planes region of Bengali peoples. The political frictions resulting from the marginalization of the district in state politics and resource allocation led to several agitations for local political control throughout the 20th century. West Bengal’s discriminatory treatment of Gorkhas contrasted starkly with the nearly benevolent treatment from the British (at least compared to the plight of other agricultural workers thought India) and the honor associated with Gorkha contributions to national defense forces.

Subash Ghising

Subash Ghising

The 1985-88 agitation for statehood was the longest and most violent, involving the organization of local parties and clashes with West Bengal police. The agitation ended with Gorkha National Liberation Front leader Subash Ghising negotiating a compromise of partial local autonomy through the establishment of the Darjeeling Gorkha Hill Council. Ghising remained in power until the fall of 2007.

Prashant Tamang

In the fall of 2007, two things happened. First, in September, Prashant Tamang, a Gorkha from Darjeeling, won Indian Idol (yes, in the style of American Idol). Tamang’s victory was aided by Bimal Gurung, a Darjeeling politician and protégé of Ghising. Gurung bottom-lined a publicity campaign encouraging Gorkhas to vote for Prashant via text message. Gorkhas all over India SMSed their votes, and celebrations for Prashant’s victory lasted late into the night. Organizing for Prashant quickly turned into political mobilization. Gurung formed the Gorkha Janmukti Morcha party in early October, confronting Ghising for his corrupt and lax leadership of the Darjeeling Gorkha Hill Council. After two decades in

Bimal Gurung

power, the effectiveness of Ghising’s leadership was questioned in the face of dodgy financial dealings and failed promises of infrastructure development. Gurung rode the wave of resurgent Gorkha pride to draw attention to the weaknesses in Ghising’s leadership.

The second thing that happened: In November, Darjeeling grew discontent with Ghising’s support for a the federal provision that tribal Nepalis be included in the sixth tribal schedule, a system of welfare for tribal groups that suffer discrimination in India society (See my earlier post on the tribal and caste schedules). He, and he alone, had been invited to talks in Delhi over the matter. The provisions of the sixth schedule would exclude the 70% of non-tribal Nepalis in Darjeeling. Gorkha’s saw Ghising’s support for the sixth schedule as an abandonment of the dream for Gorkhaland and an attempt to divide the Gorkha population. The popular hero of the 1980’s agitation was suddenly seen as a traitor and an outcaste for collaborating with government interests at the expense of his community.

Gurung’s Gorkha Janmukti Morcha party (GJM) gained increased support in Darjeeling with the allegiance of the Darjeeling Bar Association, Hill Transport Union and ex-members of the Indian Armed Forces. Subash Ghising finally had to resign in early March of this year. The federal government dropped the bill for including Nepali tribes in the sixth tribal schedule. The GJM took power and revived the campaign for statehood. The campaign involves marches, rallies, prayer services, meetings with state officials, and strikes to prevent timber export from the region and cripple the tea industry, which is largely Bengali owned. (See earlier posts for photos of the market during a strike, a candle lit vigil, and a student rally.) Their goal is to achieve Gorkhaland by March, 2010. These demands have been met with intense frustration in Kolkata and the formation of anti-Gorkhaland groups by Bengalis. Some of these groups are responsible for attacks on Gorkhas in late June.

And that’s where things are. Last I heard, all strike activities are on hold until August 7th while the party regroups. I hope this was helpful. Please post a comment if you’d like to add more information.

Sources:

Times of India: Gorkhaland, a story of political bungling
Suite 101: Indian Idol and Gorkha
Wikipedia: Gorkhaland
Darjeeling Times: Call for Gorkhaland Renewed
Live Mint WSJ: Indian Idol Reignites Demand for Gorkhaland
Unheard Voices: Racism on Both Sides of Boarder
The Himalayan Beacon: Gorkhas Campaign for New State in Darjeeling

(Ida C. Benedetto)

Gurung only interested in tripartite talks

The Gorkha Janmukti Morcha on Thursday said it was no longer interested in holding talks with the West Bengal government on Gorkhaland issue and was awaiting tripartite talks in Delhi.
GJM president Bimal Gurung made the comment while reacting to West Bengal Home Secretary A M Chakraborty’s recent statement here last week that further talks between the GJM and state government were required to find a solution to the Darjeeling problem.
Gurung said that during talks with the West Bengal Chief Minister, Buddhadeb Bhattacharjee, in the last week of June, GJM leaders had requested Bhattacharjee to take the initiative for tripartite talks involving the Centre, state government and GJM.
“But we have not received any further invitation from the government. We can give our opinion only after we receive the invitation,” Gurung said.
The GJM’s insistence on tripartite talks, meanwhile, received a shot in the arm when three major constituents of the Darjeeling district Left Front — CPI, AIFB and RSP — unequivocally stressed the need for having immediate three-way dialogue.
Darjeeling district secretary of Forward Bloc Smritish Bhattacharya told PTI that the state government should take an immediate initiative for the talks.
Similarly, the CPI district secretary, Ujjawal Choudhury, said the state government should not lose any further time for the talks and the GJM at the same time should come forward with a positive frame of mind.
RSP district secretary Benoy Chakraborty went a step further, saying, “The GJM is doing the right thing by not showing interest in talks with the state government as the government has created the situation itself by indulging Ghising for almost two decades.” (The Hindu)